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Friday, 28 September 2012

पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली-



पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |
पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब  पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -
टांग अड़ाने लगा रोज ही, काली जिभ्या बकती गाली |

लगी चाटने दीमक वह जड़, जिसने थी देखी गहराई  -
जड़मति करता दुरमति से जय, पीट रहा आनंदित ताली |

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -
आज ताकता नंगा पर्वत,  बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -
पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।।

 

8 comments:

  1. लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -
    पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।।

    very nice.

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  2. वाह ,,, बहुत बढ़िया,,,

    सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -
    आज ताकता नंगा पर्वत,बिगड़ चुकी जब हालत-माली,,,

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  3. वाह वाह वाह बहुत जबरदस्त लिखा

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  4. गीतात्मकता से संसिक्त है यह वेश रचना का .आनुप्रासिक शब्द सौन्दर्य लुभाता है .गति ताल माधुर्य सबकी अन्विति एक साथ होती है .

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  5. bahut badhiya prastuti ....mera blog aapki pratiksha men ..

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  6. क्या खूब लिखतें हैं आप रविकर भाई.
    भाव,गीत और शब्दों का अनुपम संगीत संजो देते हैं आप.
    गजब बरबस निकल जाता है मुख से.

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