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Wednesday, 26 July 2017

रविकर की कुण्डलियाँ

प्रमाणित किया जाता कि प्रकाशन हेतु प्रस्तुत रचनाएँ मौलिक और अप्रकाशित हैं | --रविकर 
(१)

माला महकौवा मँगा, रखे चिकित्सक नेक |
दिल का रोगी पूछता, कारण टेबुल टेक | 
कारण टेबुल टेक, केस यह पहला मेरा |
लेकर प्रभु का नाम, वक्ष चीरूंगा तेरा |
पहनूँगा मैं स्वयं, हृदय यदि गया सँभाला।|
वरना सॉरी बोल, तुम्हीं पर डालूँ माला ||


(२)

डॉगी क्या गायब हुआ, पागल पुलिस विभाग।
भागदौड़ करती रही, पाये नहीं सुराग। 
पाये नहीं सुराग, मातहत भी दौड़ाये।
उसी समय इक फोन, वहाँ मुखबिर का आये।
वृद्धाश्रम की ओर, पुलिस तो झटपट भागी।
वृद्धा माँ के चरण, चाटता पाया डॉगी।।



पहली प्रस्तुति

कुछ हास्य-कुछ व्यंग (विधाता छंद) 
(१)
चुनावी हो अगर मौसम, बड़े वादे किये जाते।
कई पूरे हुवे लेकिन, कई बिसरा दिए जाते।
किया था भेड़ से वादा मिलेगा मुफ्त में कम्बल
कतर के ऊन भेड़ो का, अभी नेता लिये जाते।।
(२)
फटे बादल चढ़ी नदियाँ बहे पुल जलजला आया।
बटे राहत डटे अफसर मगर आधा स्वयं खाया | 
अमीरों की रसोई में पकौड़े फिर तले नौकर।
शिविर में तब गरीबों ने कहीं गम, विष कहीं खाया ।।
(३)
नहीं पीता कभी पानी, रियाया को पिलाता है।
नकारे चाय भी अफसर, मगर वह जान खाता है।
नहीं वह चाय का प्यासा, कभी पानी नहीं मांगे 
मगर बिन चाय-पानी के, नहीं फाइल बढ़ाता है।।
(४)
उमर मत पूछ औरत की, बुरा वह मान जायेगी।
मरद की आय मत पूछो, उसे ना बात भायेगी।
फिदाइन यदि मरे मारे, मियाँ तुम मौन रह जाना।
धरम यदि पूछ बैठे तो, सियासत जान खायेगी।।
(५)
अभी दो वर्ष पहले ही हुआ शादीशुदा भाई।
पढ़ाई रूढ़िवादी ने बहन की बंद करवाई।
प्रसव-पीड़ा सहे पत्नी, नहीं पति जाँच करवाये
रहा वह खोजता महिला-चिकित्सक किन्तु ना पाये।।



प्रमाणित किया जाता कि प्रकाशन हेतु प्रस्तुत रचनाएँ मौलिक और अप्रकाशित हैं | --रविकर 

Sunday, 19 January 2014

खतरे से खिलवाड़ पर, कारण दिखे अनेक-

Monday, 13 January 2014


रविकर ले हित-साध, आप मत डर खतरे से-

खतरे से खिलवाड़ पर, कारण दिखे अनेक |
थूक थूक कर चाटना, घुटने देना टेक |

घुटने देना टेक, अगर हो जाए हमला |
होवे आप शहीद, जुबाँ पर जालिम जुमला |

भाजप का अपराध, उसी पर कालिख लेसे |
रविकर ले हित-साध, आप मत डर खतरे से ||

बानी है धमकी भरी, खफा खफा सरकार-

अब आप के कर्णधारों को सोचना चाहिए

pramod joshi 






बानी है धमकी भरी, खफा खफा सरकार |
सुनी तनिक खोटी-खरी, धरने को तैयार |

धरने को तैयार, हमेशा टाँग अड़ाएं |
करते रहे प्रचार, किन्तु अब मुँह की खाएं |

वाह केजरीवाल, नहीं है तेरी सानी |
नहीं गले अब दाल, चलो दे दो कुर्बानी ||

Friday, 17 January 2014

बेंचे धर्म-इमान, ख़रीदे कुल मुख्तारी -

हमाहमी हरहा हिये, लिये जाति-च्युत होय |
ऐसी अवसरवादिता, देती साख डुबोय |

देती साख डुबोय, प्रबंधन कौशल भारी |
बेंचे धर्म-इमान, ख़रीदे कुल मुख्तारी |

रविकर जाने मर्म, आप की जाने महिमा |
आम आदमी तंग, वक्त भी सहमा सहमा || 

सपने नयनों में पले, वाणी में अरदास-

सपने नयनों में पले, वाणी में अरदास |
बुद्धि बनाये योजना, करे कर्म तनु ख़ास |

करे कर्म तनु ख़ास, पूर्ण विश्वास भरा हो |
शत-प्रतिशत उद्योग, भाग्य को तनिक सराहो |

पाय सफलता व्यक्ति, लक्ष्य पा जाये अपने |
रविकर इच्छा-शक्ति, पूर्ण कर देती सपने ||

Monday, 13 January 2014

तड़पन बढती ही गई, नमक नमक हर घाव



हिमनद भैया मौज में, सोवे चादर तान | 
सरिता बहना झेलती, पग पग पर व्यवधान |

काटे कंटक पथ कई, करे पार चट्टान ।
गिरे पड़े आगे बढे, किस्मत से अनजान ।

सुन्दर सरिता सँवरती, रहे सरोवर घूर ।
चौड़ा हो हिमनद पड़ा, सरिता बहना दूर ।


समतल पर मद्धिम हुई, खटका मन में होय ।
दुष्ट बाँध व्यवधान से, दे सम्मान डुबोय ।

दुर्गंधी कलुषित हृदय, नरदे करते भेंट ।
आपस में फुस-फुस करें, करना मटियामेट ।


इंद्र-देवता ने किया, निर्मल मन विस्तार ।
तीक्ष्ण धार-धी से सबल, समझी धी संसार । 

तन-मन निर्मल कर गए, ब्रह्म-पुत्र उदगार।
लेकिन लेकर बह गया, गुमी समंदर धार ।


भूल गई पहचान वो, खोयी सरस स्वभाव।
तड़पन बढती ही गई, नमक नमक हर घाव ।

छूट जनक का घर बही, झेली क्रूर निगाह ।
स्वाहा परहित हो गई, पूर्ण हुई न चाह ।।

Friday, 3 January 2014

नमो नमो का खौफ, लगे शहजादे चंगे-

गे-गूंगे के दौर में, मौन मुखर हो जाय |
गूँ गूँ गे गे गड़गड़ी, सम्मुख रहा बजाय |

सम्मुख रहा बजाय, आज जाकर लब खोला |
जिसकी खाय कमाय, उन्हीं की जय जय बोला |

नमो नमो का खौफ, लगे शहजादे चंगे |
जल्दी कुर्सी सौंप, ताकि हों जल्दी नंगे ||